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निमोनिया मे कैसे रखें बच्चे का ख्याल

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Reported by Knews

Updated: Sep 07-2019 04:33:29pm
Pneumonia baby

नई दिल्ली :   निमोनिया छाती या फेफड़ों में होने यह कभी एक तो कभी दोनों फेफड़ों को प्रभावित कर सकता है। इस बीमारी में फेफड़ों में सूजन आ जाती है और तरल भी भर जाता है। इस कारण बच्चे को खांसी आती है और सांस लेने में परेशानी होती है।

 

निमोनिया दो प्रकार का होता हैं

लोबर निमोनिया : लोबर निमोनिया फेफड़ों के एक या अधिक भाग को प्रभावित करता है।

ब्रोंकाइल निमोनिया : यह दोनों फेफड़ों में चकत्ते बना देता है।

 

बच्चों में निमोनिया होने के कारण

निमोनिया होने के तीन कारण हो सकते हैं जैसे- बैक्टीरिया, वायरस और फंगल 

 

दो साल से कम उम्र उम्र के बच्चों में निमोनिया होने का खतरा ज्यादा होता है..

जो बच्चे ज्यादा धुएं और प्रदूषण के संपर्क में आते हैं.. उनमें निमोनिया का खतरा बढ़ जाता है

डिलीवरी के दौरान ग्रुप बी स्ट्रेप्टोककस के संपर्क में आने के कारण बच्चा निमोनिया का शिकार हो सकता है।

एचआईवी-एड्स या कैंसर के इलाज के कारण जिन बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है, उनमें संक्रमण का खतरा अधिक होता है।

जिनके फेफड़ों में पहले से ही संक्रमण हों, उन्हें निमोनिया का खतरा बढ़ जाता है।

 

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बच्चों में निमोनिया के लक्षण

हर बच्चे में निमोनिया के लक्षण अलग हो सकते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि निमोनिया किस कारण हुआ है। निमोनिया होने पर शुरुआत में नीचे बताए गए लक्षण नजर आ सकते हैं :

खांसी के साथ बलगम आना।

 खांसते समय छाती में दर्द होना।

 उल्टी या दस्त होना।

  भूख में कमी होना।

  थकान होना।

   बुखार होना।

 

निमोनिया के लिए घरेलू उपचार

कई ऐसे घरेलू उपचार हैं, जिनका इस्तेमाल बच्चे को निमोनिया होने पर किया जा सकता है। नीचे हम इन्हीं घरेलू उपचारों के बारे में बता रहे हैं :

 

हल्दी : बच्चे को निमोनिया में आराम दिलाने के लिए हल्दी काफी फायदेमंद मानी जाती है। हल्दी में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं, जो कई बीमारियों से दूर रखने में मदद करते हैं। निमोनिया होने पर थोड़ी-सी हल्दी गुनगुने पानी में मिलाएं और बच्चे की छाती पर लगाएं। इससे बच्चे को राहत मिलेगी 

 

लहसुन का पेस्ट : लहसुन को भी निमोनिया के लिए कारगर माना जाता है इसके लिए लहसुन की कुछ कलियों को पीसकर उसका पेस्ट बना लें और रात को सोने से पहले बच्चे की छाती पर लगाएं।

 

तुलसी : तुलसी में एंटी-इन्फ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं  तुलसी की कुछ पत्तियों को पीस कर उसका रस निकाल लें। तुलसी का रस थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में दो बार बच्चे को पिलाने से निमोनिया में राहत मिलती है।

 

च्चे को निमोनिया होने से रोकने के लिए क्या करें

ऐसे कई तरीके हैं, जिनकी मदद से आप बच्चे को निमोनिया होने से रोक सकती हैं। कुछ सावधानियां बरतकर बच्चे को इस बीमारी से बचाया जा सकता है, जैसे :

संपूर्ण टीकाकरण : बच्चे को निमोनिया से बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि उसे बचपन में सभी जरूरी टीके लगें। न्यूमोकोकल टीका (पीसीवी) लगाने से निमोनिया, सेप्टिसीमिया (एक प्रकार का संक्रमण), मैनिंजाइटिस (दिमागी संक्रामक रोग, जो ज्यादातर बच्चों को होता है) और रक्त विषाक्तता के कुछ मामलों में सुरक्षा देता है। इसके अलावा, डिप्थीरिया, काली खांसी और एचआईवी के इंजेक्शन निमोनिया से बचाव करने में मदद करते हैं।

साफ-सफाई पर ध्यान दें : बैक्टीरिया न फैले इसके लिए आपको व्यक्तिगत साफ-सफाई पर भी ध्यान देना होगा। छींकते-खांसते समय हमेशा मुंह और नाक को ढक लें। इसके अलावा, समय-समय पर बच्चे के हाथ भी धोती रहें।

 

प्रदूषण से दूर रखें : श्वसन संबंधी समस्या दूर रहे, इसके लिए जरूरी है कि आप अपने बच्चे को धूल-मिट्टी व प्रदूषण वाली जगह से दूर रखें। बच्चे को उस माहौल में न रहने दें, जहां आसपास लोग धूम्रपान करते हों। इससे उन्हें सांस संबंधी परेशानियां जल्दी पकड़ सकती हैं।

पर्याप्त पोषण दें : किसी भी तरह की बीमारी से बचने के लिए जरूरी है कि बच्चे को पर्याप्त पोषण दिया जाए, ताकि उसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बने और वो बीमारियों से लड़ सके। अगर बच्चा छह महीने से कम का है, तो उसे नियमित रूप से स्तनपान कराएं, क्योंकि स्तनदूध में एंटीबॉडीज होते हैं, जो प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद करते हैं। वहीं, अगर बच्चा ठोस आहार खाता है, तो उसे जरूरी पोषक चीजें भरपूर मात्रा में खिलाएं।

भीड-भाड़ वाली जगह से दूर रहें : बच्चे को भीड़-भाड़ वाली जगह से दूर रखें। ऐसी जगहों पर संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा होता है।

बच्चे में निमोनिया के लक्षण नजर आते ही उसका तुरंत इलाज करवाना शुरू कर देना चाहिए। उम्मीद है कि बच्चे को निमोनिया होने से संबंधित सभी जानकारियां इस लेख में आपको मिल गई होंगी। इसलिए, सतर्कता बरतें और लक्षण नजर आने पर ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए बच्चे का इलाज करवाएं