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"उत्तराखंड : 2014 से पिछड़ा 2019"

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Reported by Knews

Updated: Apr 13-2019 01:15:39pm
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J.Thomas: उत्तराखंड की पांचों लोकसभा सीटों पर 11 अप्रैल को मतदान प्रक्रिया के साथ ही आरोप प्रत्यारोप का दौर सम्पन्न होने के बाद अब बीजेपी और कांग्रेस के बीच जीत के दावों की जुबानी जंग शुरू हो गई है। बीजेपी जहां वोटिंग को मोदी मैजिक बता कर 2014 का इतिहास दोहराने का दम भर रही है तो वहीं कांग्रेस पिछ्ली हार का हिसाब बराबर करने का दावा ठोक रही है। बात अगर  2014 लोकसभा चुनाव की करें तो मोदी लहर से सूबे में  अच्छी खासी वोटिंग की बदौलत  बीजेपी 5-0 से कांग्रेस का सूपड़ा साफ करने में भी कामयाब हुई थी। 

इस बार भी ऐसा लग रहा था कि पुलवामा हमले का बदला लेने के लिए  की गई एअर स्ट्राइक का असर सैनिक बाहुल उत्तराखंड में पिछ्ली बार की  वोटिंग से भी बढ़कर  देखने को मिलेगा। दोपहर 1 बजे तक करीब 41 फीसदी मतदान इस ओर इशारा भी कर रहा था लेकिन  देर शाम आए मतदान के अनंतिम आंकड़ों से ऐसा लगा मानो  1 से 5 बजे के बीच मतदाताओं का जोश ठंडा रहा, जो बम्पर वोटिंग की ओर जाता दिख रहा था वो ग्राफ वोटिंग खत्म होते - होते पिछली बार  से भी नीचे 57.85 फीसदी पर आकर थम गया जबकि  2014 लोकसभा चुनाव की बात करें तो राज्य में 62.15 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। हालांकि मतदान प्रतिशत की असल  तसवीर वोटिंग की अगली शाम तक ही साफ हो पाई जब निर्वाचन विभाग  ने अंतिम आंकड़े जारी किए। इस बार  सूबे में 61.50 फीसदी मतदान  हुआ यानी पिछली बार के मुकाबले  0.65 प्रतिशत कम जबकि राज्य में  2004 से लेकर 2014 तक के लोकसभा चुनाव में हर बार वोटिंग प्रतिशत में बढ़ोतरी देखने को मिली थी।

फौजियों  के सूबे कहे जाने वाले उत्तराखंड में  चुनाव के ऐलान के बाद सबसे पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की रैली हुई जिसमें उन्होंने 'चौकीदार चोर' के नारे से न केवल पीएम मोदी पर जमकर हमला बोला बल्कि सुस्त पड़े संगठन में जान फूंकने का काम भी किया। पार्टी  देश -प्रदेश में " चौकीदार" पर तीखे हमले के अलावा हर साल 5 करोड़ गरीब परिवारों के खाते में  के 72 हज़ार देने के वायदे से बड़ी उम्मीद पाले बैठी थी कि हाथ का साथ देने के लिए वोटर थोक के भाव घर से निकलेंगे।

वहीं बीजेपी  राष्ट्रवाद के नारे, ज़मीन पर मजबूत संगठन, बड़े नेताओं की रैलियां- रोड शो के साथ पीएम मोदी की 3 सभाओं (1 फोन से ) से फुल चार्ज थी। भ्रष्टाचार पर सोनिया- राहुल को लपेटने , कांग्रेस पर पाकिस्तान परस्त होने  का आरोप चस्पा करने के साथ एयर स्ट्राइक, वन रैंक वन पेंशन और  उत्तराखंड में पांचवें धाम" सैनिक धाम " जैसे  मुद्दों के सहारे बीजेपी भी यह मानकर चल रही थी कि उसे वोट देने जन सैलाब उमड़ेगा लेकिन हुआ दोनों दलों की उम्मीदों के बिल्कुल उलट। मतदान के मोर्चे पर नया रिकॉर्ड बनाना तो दूर उत्तराखंड 2014 के लोकसभा चुनाव के मतदान की बराबरी भी नही कर पाया। वोटर का घर से कम निकलना, कई जगह स्थानीय मुद्दे को लेकर वोटिंग बहिष्कार, वोटर की उदासीनता और नाराज़गी जाहिर कर रहा है और इसने नतीजों को लेकर कांग्रेस और बीजेपी दोनों की टेंशन बढ़ा दी है। आपको बता दें कि सूबे के तकरीबन दर्जन भर बूथों पर लटके लोकल मुद्दों से नाराज़ जनता ने वोटिंग का बहिष्कार कर अपना विरोध जाहिर किया। अगर यह बहिष्कार न हुआ होता तो यकीनन मतदान का आंकड़ा नया कीर्तिमान स्थापित करता। 

पर्वतीय भूगोल वाली अल्मोड़ा और पौड़ी सीट पर क्रमशः 51.82 और 54.47 फीसदी वोटिंग हुई। वोटिंग में आई गिरावट को कांग्रेस अपनी पार्टी के अपने पक्ष में मान रही है और टिहरी में 2014 के मुकाबले 1 प्रतिशत की कमी को भी कमल के मुरझाने का संकेत बता रही है। वहीं  मैदान- तराई की हरिद्वार और नैनीताल सीट जहां दलित और मुस्लिम वोट जीत हार में अहम किरदार अदा करता है, वहां  करीब 68 -68 प्रतिशत के मतदान को भी कांग्रेस अपने लिए शुभ और फायदेमंद मानकर चल रही है। उधर  बीजेपी की माने तो 23 मई से पहले वोटिंग प्रतिशत को लेकर कांग्रेस चाहे जितना खुशफहमी  पाल ले नतीजे साफ कर देंगें कि मैदान हो या पहाड़ पांचों सीटों पर पंजे को परास्त कर एक बार फिर कमल ही खिलने वाला है।

खैर, सूबे की 5 सीटों पर कुल 52 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में बंद हो चुकी है, दोनों दलों के दावे से इतर जीत किसकी हुई है इसके लिए इंतज़ार 23 मई का करना होगा। इतना जरूर है कि नतीजों को लेकर ज्यादा दवाब बीजेपी पर है क्योकि 2014 में पांचों सीटें उसी के नाम रही थीं अगर कांग्रेस अपना खाता खोलने में भी कामयाबी हुई तो यकीनन पार्टी में नए जोश और ऊर्जा का संचार होगा जो उसके लिए 2022 में होने वाले सूबे के सत्ता संग्राम में बीजेपी से लोहा लेने में काफी मददगार साबित होगा। हां अगर कहीं ऊंच - नीच हुई तो पिछ्ली हारों से पस्त पार्टी के लिए बड़ी चुनौती वजूद को बचाये रखने की होगी। इसके अलावा एक और बड़ा सवाल है कि क्या इस बार वो मिथक टूटेगा जिसके तहत अबतक सूबे में जिस पार्टी की सरकार रही है  लोकसभा चुनाव में उस पार्टी को पराजय झेलनी  पड़ी है। सवाल कई हैं मगर जवाब के लिए अटकलों के बजाए 23 मई तक इंतज़ार करना बेहतर है।