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Friday, 16 November 2018

आपदा के जख्मों से उभरने लगे कालीमठ घाटी के लोग

Reported by KNEWS | Updated: Mar 01-2018 11:20:14am


रुद्रप्रयाग : जून 2013 की केदारनाथ आपदा ने कालीमठ घाटी के सैंकड़ों परिवारों को ऐसा जख्म दिया जो शायद ही कभी भुलाया जा सकता है। कालीमठ घाटी के लोगों की आजीविका भी केदारनाथ यात्रा पर ही निर्भर थी। यहां के लोग केदारनाथ यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर घोडे-खच्चर, डंडी-कंडी, होटल एवं लाॅज चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।

 

लेकिन 2013 की विनाशकारी आपदा ने सबकुछ तबाह कर दिया। कालीमठ घाटी के हर परिवार से सात से 10 लोगों की मौते हुई हैं, वहीं उनका रोजगार भी समाप्त हो गया। लेकिन घाटी के लोगों की मजबूत और दृढ़ इच्छा शक्ति ही कह सकते हैं कि उस भयंकर प्रलय के बाद भी खुद को पटरी पर लाये हैं।

 

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केदारनाथ आपदा के बाद राज्य व केन्द्र सरकारों का ध्यान सिर्फ केदारनाथ धाम को संवारने पर ही रहा है। सरकारों ने आपदा प्रभावितों को उनके हाल पर छोड़ दिया था। कालीमठ घाटी के अंतिम गांव जाल, चैमासी, कोटमा के साथ ही 11 गांवो की ग्रामीण महिलाओं ने मधुमक्खी पालन, सब्जी, हल्दी, अदरक और रेशम उत्पादन को अब आजीविका का सहारा बनाया है। आपदा के उस भीषण दंश को झेलने के बाद वे पटरी पर लौटने की कोशिश कर रहे हैं। चैमासी गांव के 60 परिवारों में से 45 परिवार मधुमक्खी पालन करते हैं, इससे उनकी वार्षिक आयु करीब 20 हजार तक हो जाती है।

 

जबकि सब्जी मसाले, रेशम उत्पादन से करीब 50-60 हजार रुपये की सालाना आय प्राप्त होती है। वहीं कई ग्रामीण महिलाएं उलझे धागों से जीवन की डोर सुलझा रहे हैं। सिलाई बुनाई को ही उन्होंने अपनी आजीविका का साधन बनाया है। उद्यान विभाग की ओर से इन ग्रामीणों को पूरा सहयोग मिल रहा है। ग्रामीणों को मधुमक्खी पालन के विभिन्न उपकरण दिये जा रहे है तथा स्वावलम्ब बनने के गुर सिखाये जा रहे हैं। ग्रामीणों द्वारा उत्पादित सामग्री भी यह कम्पनी खरीदती है ताकि ग्रामीणों को अपने उत्पादन बेचने में कठिनाईयां न हो।

 

वहीं उद्यान विभाग भी इन ग्रामीणों को सब्जी के बीज खाद, पाॅलीहाउस आदि कृषि उपकरण उपलब्ध करवाकर किसानों को प्रोत्साहित करते हैं। केदारनाथ की उस भयावाह त्रासदी ने इन ग्रामीणों को कभी न भूलने वाला जख्म दिया है लेकिन ग्रामीण महिलाओं की दृढ़ इच्छा शक्ति का ही परिचय है कि वे खुद को खड़ा कर पाये हैं। न सिर्फ वे उस आपदा को भूलाने की कोशिस कर रहे हैं, बल्कि स्वावलम्ब की तरफ भी अपने मजबूत कदम बढ़ा रहे हैं। 

 

वहीं जिला उद्यान विभाग का कहना है कि ग्रामीणों को रोजगार से जोड़ने का प्रयास किया है। उन्हें मधुमख्खी पालन के गुर सिखाए गये, जिससे वे आज अपने पैरो पर खड़े हो गये हैं। इसके साथ ही ग्रामीणों को सब्जी उत्पादन की भी जानकारी दी गई है। 

                                                                                          रुद्रप्रयाग से रोहित डिमरी 


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