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Monday, 19 November 2018

सबके लिए एक मिसाल है सेलाकुई की महिलाएं

Reported by KNEWS | Updated: Mar 08-2018 12:34:17pm


विकासनगर : महिला दिवस पर देश में जगह-जगह सामाजिक संगठन और राजनेता विभिन्न कार्यक्रम कर महिलाओं के उत्थान और उन्हें सम्मान देने के बड़े-बड़े बखान कर रहे हैं। प्रदेश में भी कई कार्यक्रमों का आयोजन हुआ, लेकिन क्या महिलाओं का आज तक उत्थान हो पाया? क्या उन्हें वह सम्मान मिल पाया? जो उन्हें मिलना चाहिए था।

 

पछवादून क्षेत्र की सेलाकुई ईलाके की कुछ महिलाओं की जिन्दगी ऐसी है जो न केवल अन्य महिलाओं के लिये प्ररेणास्रोत हैं, बल्कि सरकारी दावों व वायदों की जमीनी हकीकत से भी रूबरू कराने के लिए काफी है। विकासनगर तहसील अंतर्गत आने वाले सैकड़ों ग्रामीण इलाकों में आज भी यहां की जनता मूलभूत सुविधाओं के दर-ब-दर भटकने को मजबूर हैं।

 

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जिसमें सबसे ज्यादा संख्या उन बेसहारा महिलाओं की हैं, जिनके पति या तो अब इस दुनिया में नहीं है, या फिर उन्हें पारिवारिक व अन्य कारणों के चलते दर-दर की ठोकरे खाने को मजबूर होना पड़ रहा हैं। जिसके चलते विकासनगर तहसील अंतर्गत इन बेसहरा व सिस्टम से परेशान महिलाओं की संख्या सैकड़ों में है, लेकिन बात अगर सहसपुर विधानसभा के सेलाकुई क्षेत्र की कि जाए तो दर्जनों बेसहारा ऐसी महिलाएं है, जो बिना किसी सरकारी सहायता के काफी जद्दोजहद भरी जिन्दगी गुजारने को मजबूर हैं।

 

इन्हीें में से एक हैं रोशनी देवी जो करीब 65 बरस की उम्र में अपनी मंदबुद्धि बेटी के लालन पालन के लिये कागज की थेैलियां बनाकर किसी तरह अपना गुजर बसर कर रहीं। नियति का खेल तो देखिये पांच बरस पहले विधाता ने उनके पति को अपने पास बुला लिया, एक बेटा है भी वह भी अपनी बुढ़ी मां और बहन को छोड़ अलग ही रहता है। जिस वजह से रोशनी देवी को अपना व अपनी बेटी का पेट पालने के लिये थैलियां बनाकर किसी तरह अपना गुजर बसर करना पड़ रहा है। आलम यह है कि इस बुढ़ापे में आज तक भी न तो इनकी वृद्धावस्था पेंशन ही लग पाई है और न ही विधवा पेंशन।

 

यहां तक की इनकी मंदबुद्धि विकलांग बेटी को भी आज तक किसी भी तरह की सरकारी सहायता नहीं मिल पायी है, जिसके लिए यह लोग ग्राम प्रधान से लेकर स्थानीय जनप्रतिनीधियों व विधायक और अधिकारियों तक चक्कर लगा चुकी हैं, लेकिन इनको कोई मदद मिलना तो दूर की बात कोई आश्वासन तक नहीं मिला। कमोबेश यही हालत सेलाकुई की हीं मीरा सक्सेना,संगीता चैधरी और कविता तिवारी का भी है। जो जवानी में ही विधवा हो गई, लेकिन इन्होनें हिम्मत नहीं हारी। बल्कि हर मुश्किल का सामना करते हुये मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार को पालने पोसने और अपने बच्चों को पढ़ाने लिखाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

 

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मीरा के मुताबिक वह लोग करीब 16 साल पहले यूपी के शहजांहनपुर से सेलाकुई आकर बसे थे, लेकिन पति के शराब पीने की लत ने 15 साल पहले उनकी जिन्दगी लील ली। जिसके बाद उसने अपने दो साल के मासूम बेटे की परवरिश के लिए लोगों के घरो में काम करके किसी तरह अपने आप को संभाला और आज भी महज पांच हजार रूपये की मामूली मेहनताने में अपने परिवार का गुजर बसर चलाने के साथ ही अपने बेटे की पढ़ाई लिखाई करवा रही हैं।

 

मीरा का कहना है कि सालों से बेसहारा और विधवा होने के बावजूद भी उन्हें आज तक भी कोई सरकारी सहायता नहीं मिल पाई और न ही उनकी किसी ने पेंशन लगाई, यहां तक कि उनका राशन कार्ड भी गरीबी रेखा से नीचे का बनाने के बजाय उससे ऊपर का बनाया गया जिस वजह से उन्हें राशन भी मंहगे दाम पर खरीदना पड़ रहा है। 

                                                                                               विकासनगर से तबरेज खान


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