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Monday, 22 October 2018

घटता जल, सूखता भारत, गहराता संकट

Reported by KNEWS | Updated: Mar 22-2018 02:22:39pm


नई दिल्ली : जल ही जीवन है और इसके बिना हम जीने की कल्पना तक नहीं कर सकते। ये हमें प्रकृति से मिला वो उपहार है। जिसकी हम कद्र नहीं कर पा रहे है। क्या आपको पता है हमारी पृथ्वी पर एक अरब 40 घन किलो लीटर पानी है।

 

इसमें से 97.5 प्रतिशत पानी समुद्र में है, जो खारा है, शेष 1.5 प्रतिशत पानी बर्फ़ के रूप में ध्रुव प्रदेशों में है। इसमें से बचा एक प्रतिशत पानी नदी, सरोवर, कुओं, झरनों और झीलों में है जो पीने के लायक है।

 

इस एक प्रतिशत पानी का 60 वाँ हिस्सा खेती और उद्योग कारखानों में खपत होता है। बाकी का 40 वाँ हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ़-सफ़ाई में खर्च करते हैं।

 

 

दुनियाभर में पीने के पानी की कमी लगातार हो रही है भले ही देश की सबसे बड़ी गंगा नदी से लेकर सैकड़ों छोटी बड़ी नदियों यही से निकलती है लेकिन यहां भी प्राकृति जलस्त्रोतों की स्थिति अच्छी नही है जिस पर वैज्ञानिक भी चिन्ता जता रहे हैं।

 

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वहीं जल हमारे जीवन के लिए कितनी जीवनदायनी है। इसकी हम बात करेंगे विश्व जल दिवस पर। जो हर साल 22 मार्च को पूरी दुनिया में मनाया जाता है। प्रकृति जीवनदायी संपदा जल हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है, हम भी इस चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चक्र को गतिमान रखना हमारी ज़िम्मेदारी है, चक्र के थमने का अर्थ है, हमारे जीवन का थम जाना। प्रकृति के ख़ज़ाने से हम जितना पानी लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है।

 

 

हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते अतः प्राकृतिक संसाधनों को दूषित न होने दें और पानी को व्यर्थ न गँवाएँ यह प्रण लेनाबहुत आवश्यक है। पहले कहा गया था कि हमारा देश वह देश है जिसकी गोदी में हज़ारों नदियाँ खेलती थी, आज वे नदियाँ हज़ारों में से केवल सैकड़ों में ही बची हैं। कहाँ गई नदियाँ, कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ दो, हमारे गाँव-मोहल्लों से तालाब आज गायब हो गए हैं, इनके रख-रखाव और संरक्षण के विषय में बहुत कम कार्य किया गया है।

 

वैज्ञानिकों की माने तो  हिमपात न होने से गर्मियों में नदियों में जल प्रवाह मे लगातार कमी आ रही है  गर्मियों में प्रमुख ग्लेशियरों पर आधारित भागीरथी और अलकनन्दा जैसी नदियों में जल प्रवाह में 50 प्रतिशत की कमी आ गई है। वैज्ञानिक इसे दुर्भाग्य ही मानते हैं कि प्रदेश मे नदियों की कोई कमी नही है लेकिन फिर भी पानी की कमी लगातार बन रही है अब वैज्ञानिक भी मान रहे हैं कि जलस्त्रोतों को पारम्परिक तरीके से बचाना होगा। जिससे पानी के संकट से बचाया जा सकता है। 


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कब मनाने जाने लगा विश्व जल दिवस 

 

1992 में  रियो डि जेनेरियो में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन  में पहली बार विश्व जल दिवस की पहल की गई। 1993 में पहली बार विश्व जल दिवस मनाया गया था और संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1992 में अपने 'एजेंडा 21'में रियो डी जेनेरियो में इसका प्रस्ताव दिया था। तभी से हर साल 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाने लगा। इस दिन को हम पानी बचाने के संकल्प का दिन मानते है। पानी के महत्व को जानने का दिन और पानी के संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन। विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है। और कुछ लोग ऐसे जो पानी की बरबादी करते है जिन पर कोई कंट्रोल नहीं है। 


 

पानी का महत्व 

 

वहीं जानकार मानते हैं कि पानी की पूर्ति के लिए जनता का सहयोग व हर स्तर पर पानी के महत्व को समझने की जरूरत है, हालांकि सरकार इसके लिए प्रयास करती है लेकिन तमाम योजनाऐं लोगों तक नही पहुंच पाती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि उतराखंड में नदियों के किनारे ही लोगों को पीने का पानी नही मिल पा रहा है सुप्रीम कोर्ट के मुताबित पानी समुदाय का है लेकिन इसका लगातार दोहन हो रहा है। कहीं जल विद्युत परियोजना पानी की अपूर्ति को ठप्प कर रहे हैं तो कहीं बड़ी बड़ी परियोजनाओं से पारम्परिक जल स्त्रोतों को खत्म किया जा रहा है इस पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। 

 

समय आ गया है जब हम वर्षा का पानी अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करें। बारिश की एक-एक बूँद कीमती है। इन्हें सहेजना बहुत ही आवश्यक है। यदि अभी पानी नहीं सहेजा गया, तो संभव है पानी केवल हमारी आँखों में ही बच पाएगा। इनके रख-रखाव और संरक्षण के विषय में बहुत कम कार्य किया गया है। पानी का महत्व भारत के लिए कितना है। वो दिन दूर नहीं, जब सारा पानी हमारी आँखों के सामने से बह जाएगा और हम कुछ नहीं कर पाएँगे।

 

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समुद्री पानी को पेयजल बनाने में महारथी है इजरायल


दुनिया में इजराइल इकलौता देश है, जिसने समुद्र के खारे पानी को पीने लायक बनाने की तकनीक ईजाद की है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2050 तक जब विश्व की 40 फीसदी आबादी जल संकट भोग रही होगी, तब भी इजराइल में पीने के पानी का संकट नहीं होगा। इजराइल न सिर्फ हथियारों, बल्कि पानी के मामले में भी महाशक्ति बनकर उभरा है।

 

जिस संयंत्र से इजराइल पानी को पीने योग्य बनाता है  वह ‘गैलमोबाइल वाटर फिल्ट्रेशन प्लांट’ कहलाता है।

 

 

 

यह चलित फिल्टर प्लांट है। नेतन्याहू इसे ‘फ्यूचर जीप’ कहते हैं।  हालांकि दुनिया के वैज्ञानिक इन कोशिशों में लगे हैं कि खारे पानी को मीठा बनाने के सरल व सुविधायुक्त संयंत्र ईजाद कर लिये जाएँ। लेकिन अभी इजराइल जैसी सफलता किसी अन्य देश को नहीं मिली है।

 

कई राज्यों में जलसंकट 

 

साल दर साल गर्मी का पारा बढ़ता जा रहा है जंगल सूख रहे है और पानी घटता जा रहा है। गर्मी के मौसम में चिलचिलाती धूप कईयों को निगल जाती है।

 

 

 

वजह है धरती पर पानी की कमी।  देश के बड़े राज्य मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान के बहुत सारे क्षेत्रों में ऐसी ही हालत है। वहाँ कई इलाक़ों में हर साल गर्मियों में पानी की कमी हो जाती है। भारत के मेट्रोपोलिटन सिटी मुंबई की बात करें तो यहां पानी का सबसे ज्यादा संकट रहता है।

 

 

 

वहीं बात करें महाराष्ट्र की तो यहां का उत्तरी इलाका जहां बीड, नांदेड, परभणी, जालना, औरंगाबाद, नाशिक और सतारा सूखे की स्थिति का सामना कर रहे हैं। दक्षिणी कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में तो पानी के नाम पर दंगों की खबरें आ रही है।

 

भारत के केंद्रीय भूजल बोर्ड के मुताबिक कम बारिश ने देश में भूजल का स्तर काफी घटा दिया। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट बताती है कि अगर नीति बनाने वालों ने जल संसाधन की व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया तो भारत के ज्यादातर बड़े शहर 2020 तक सूख जाएं। 

                                                                                                नई दिल्ली से ज्योति सिंह
 


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